- 26 जून 2026
- Himanshu Kumar
- 10
जब अमिताभ बच्चन की फिल्म डॉन 1978 में रिलीज हुई, तो कोई नहीं जानता था कि यह हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक बन जाएगी। शुरुआती हफ्ते में इसे 'फ्लॉप' घोषित किया गया था। लेकिन फिर हुआ कुछ ऐसा कि इतिहास बदल गया। एक गाने ने न केवल फिल्म को बचाया, बल्कि उसे 'कल्ट क्लासिक' का दर्जा दिला दिया। आश्चर्य की बात यह है कि सालों बाद भी इस फिल्म को लेकर विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं।
यह कहानी सिर्फ बॉक्स ऑफिस की संख्याओं की नहीं है। यह एक ऐसी फिल्म की कहानी है जिसकी शुरुआत उम्मीदों के पार असफलता से हुई, लेकिन अंत में वह धूम मचा गई। चलिए, जानते हैं कि कैसे एक निर्णय और एक गाने ने डॉन के भाग्य को मोड़ दिया।
शुरुआती असफलता: जब डॉन थी फ्लॉप
1978 में जब डॉन थिएटर्स में आई, तो उसका स्वागत ठंडा था। फिल्म का निर्देशन चंद्रा बारोट ने किया था, लेकिन मार्केटिंग या प्रमोशन का कोई बड़ा जोर नहीं था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहली हफ्ते में ही फिल्म को 'कंप्लीट फ्लॉप' घोषित कर दिया गया था।
उस समय अमिताभ बच्चन अपने करियर के एक ऐसे दौर से गुजर रहे थे जहां लगातार असफल फिल्में उन्हें परेशान कर रही थीं। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, अमिताभ ने अपने करियर की शुरुआत में 11 बॉक्स-ऑफिस फ्लॉप्स का सामना किया था और वे अभिनय छोड़ने के बारे में सोच रहे थे। डॉन की शुरुआती असफलता ने उन्हें और भी निराश किया।
वह एक गाना जो सब बदल गया
लेकिन कहानी यहीं पर मोड़ लेती है। फिल्म में एक गाना था - 'खाएं पाँ बारांगवाला'। शुरू में यह गाना फिल्म का हिस्सा नहीं था या कम दिखाया गया था। लेकिन जब इसे अंतिम रूप देकर फिल्म में शामिल किया गया, तो दर्शकों का रिएक्शन अनोखा था।
चंद्रा बारोट ने अपनी पुस्तक और इंटरव्यू में बताया कि कैसे मनोज कुमार की सलाह ने फिल्म को बचाया। मनोज कुमार ने सुझाव दिया कि इस गाने पर ज्यादा जोर दिया जाए। जैसे ही यह गाना रिलीज हुआ, यह रातों-रात हिट हो गया। लोग सिनेमाघरों में इस गाने को देखने के लिए लौट आए।
"लखें पाँ बारांगवाला..." इस गाने ने न केवल संगीत चार्ट्स पर धूम मचाई, बल्कि डॉन को एक ब्लॉकबस्टर में तब्दील कर दिया।
निर्माता की दुखद कहानी
फिल्म की सफलता के पीछे एक बहुत ही दुखद पहलू भी छिपा है। डॉन के निर्माता नरीमन ईरानी थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, फिल्म की शूटिंग और रिलीज के दौरान नरीमन ईरानी गहरे ऋण के बोझ तले दबे हुए थे। वे इतनी गरीबी में थे कि उनके पास भोजन के लिए भी पैसों की कमी थी।
हालांकि, उनकी मौत फिल्म की सफलता से ठीक पहले हो गई। उन्होंने कभी यह दिन नहीं देखा जब उनकी मेहनत इनाम में मिली। यह एक ऐसा तथ्य है जो आज भी फिल्म के इतिहास में एक दर्दनाक अध्याय के रूप में याद किया जाता है।
क्रिएटिव डायलॉग और आंतरिक संदेह
फिल्म की सफलता के बावजूद, क्रिएटिव टीम के बीच कुछ मतभेद भी थे। प्रसिद्ध लेखक जावेद अख्तर, जिन्होंने फिल्म का संवाद लिखा था, ने कहा था कि फिल्म का दूसरा आधा हिस्सा 'बहुत सूखा' (too dry) था। उनका मानना था कि फिल्म की गतिविधि में कमी थी।
हालांकि, अमिताभ बच्चन की स्क्रीन प्रेजेंस और 'खाएं पाँ बारांगवाला' जैसे गानों ने इन कमियों को पूरा कर दिया। आज, डॉन को न केवल एक एक्शन फिल्म के रूप में देखा जाता है, बल्कि एक सांस्कृतिक घटना के रूप में भी।
आज भी क्यों चल रहा विवाद?
2026 में भी, जब जागरण जैसे पोर्टल्स और सोशल मीडिया पर डॉन के बारे में चर्चा होती है, तो विवाद की बातें सामने आती हैं। ये विवाद मुख्य रूप से फिल्म के कॉपीराइट, रीमेक अधिकारों और मूल कहानी के स्रोत से जुड़े हैं। कई बार यह सवाल उठता है कि क्या डॉन की कहानी किसी अन्य फिल्म या साहित्यिक कार्य से प्रेरित थी।
सोशल मीडिया पर, विशेष रूप से इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियो में, डॉन की सफलता की कहानी को बार-बार दोहराया जा रहा है। RD News Network जैसे चैनलों ने हाल ही में वीडियो जारी किए हैं जो बताते हैं कि कैसे एक फ्लॉप फिल्म एक गाने के कारण हिट हुई।
Frequently Asked Questions
क्या डॉन फिल्म की शुरुआत में फ्लॉप थी?
हाँ, 1978 में रिलीज होने के बाद डॉन को पहली हफ्ते में 'फ्लॉप' घोषित किया गया था। फिल्म का प्रमोशन कम था और दर्शकों का उत्साह शुरुआत में कम था। हालांकि, बाद में 'खाएं पाँ बारांगवाला' गाने की लोकप्रियता ने फिल्म को ब्लॉकबस्टर बना दिया।
किस गाने ने डॉन फिल्म को हिट बनाया?
'खाएं पाँ बारांगवाला' गाने ने डॉन फिल्म के भाग्य को बदल दिया। यह गाना दर्शकों में बहुत लोकप्रिय हुआ और लोगों को सिनेमाघरों में वापस लौटने के लिए प्रेरित किया। निर्देशक चंद्रा बारोट ने भी इस गाने की महत्वपूर्ण भूमिका की पुष्टि की है।
डॉन के निर्माता नरीमन ईरानी की क्या स्थिति थी?
नरीमन ईरानी फिल्म की रिलीज के दौरान गहरे ऋण में थे और आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे। दुर्भाग्यवश, उनकी मृत्यु फिल्म की सफलता से ठीक पहले हो गई, इसलिए वे कभी अपनी फिल्म की सफलता का लाभ नहीं उठा सके।
आज भी डॉन फिल्म को लेकर विवाद क्यों चल रहे हैं?
डॉन फिल्म को लेकर विवाद मुख्य रूप से कॉपीराइट, रीमेक अधिकारों और मूल कहानी के स्रोत से जुड़े हैं। कई बार यह सवाल उठता है कि फिल्म की कहानी किससे प्रेरित थी। इसके अलावा, फिल्म के किरदारों और संवादों पर भी समय-समय पर बहस होती रहती है।
मनोज कुमार की भूमिका डॉन की सफलता में क्या थी?
मनोज कुमार ने निर्देशक चंद्रा बारोट को सलाह दी थी कि 'खाएं पाँ बारांगवाला' गाने पर ज्यादा जोर दिया जाए। इस सलाह ने फिल्म के मार्केटिंग और प्रचार में मदद की, जिससे दर्शकों का ध्यान आकर्षित हुआ और फिल्म सफल हुई।
10 टिप्पणि
सच कहूँ तो नरीमन ईरानी की कहानी सुनकर दिल ही भारी हो जाता है। इतनी मेहनत, इतना संघर्ष और फिर सफलता देखने का मौका नहीं मिला। यह सिर्फ एक फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि उन सभी निर्माताओं और कर्मचारियों की कहानी है जो पीछे रह जाते हैं। आज के दौर में भी कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, लेकिन उन्हें क्रेडिट या फायदा नहीं मिला। हमें ऐसी कहानियों को याद रखना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी गलतियां न हों।
आपको लगता है कि यह सिर्फ एक गाने की वजह से हिट हुई? मुझे तो लगता है कि इसमें बहुत गहरा साज़िश थी शायद स्टूडियो वाले जानबूझकर शुरू में कम प्रचार कर रहे थे ताकि बाद में ज्यादा कमाई कर सकें। मनोज कुमार की सलाह भी शक की गुंजाइश छोड़ती है क्योंकि वे उस समय बहुत 영향शाली थे। शायद वे अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहते थे।
यह बात सही है कि फिल्म की शुरुआती असफलता अमिताभ बच्चन के लिए निराशाजनक थी, लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अगर वे उस समय अभिनय छोड़ देते तो आज हमारे पास 'अंग्रेजी मीडियम' जैसी फिल्में नहीं होतीं। उनकी दृढ़ता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
टेक्निकली देखें तो चंद्रा बारोट की डायरेक्शन में कुछ खामियां जरूर थीं जैसे आपने उल्लेख किया कि दूसरा आधा हिस्सा सूखा था। लेकिन मार्केटिंग की रणनीति गलत थी। 1978 के समय में ऑडियंस का व्यवहार आज से काफी अलग था। गाना सिर्फ एक ट्रिगर था, असली कारण था स्टार पावर और वर्ड ऑफ माउथ।
आप लोग इतने भावुक क्यों हो जाते हैं? यह सिर्फ बिजनेस था। नरीमन ईरानی ऋण में थे, यह उनकी अपनी गलती थी कि उन्होंने जोखिम लिया। फिल्म इंडस्ट्री में जो जोखिम लेता है उसे नुकसान भी सहना पड़ता है। अमिताभ बच्चन तो अपनी छवि बना रहे थे, उन्हें क्या फर्क पड़ता था कि निर्माता कैसे है।
मुझे लगता है कि हमें इस फिल्म को एक सांस्कृतिक घटना के रूप में देखना चाहिए। 'खाएं पांच बारंगवाला' सिर्फ एक गाना नहीं था, वह उस समय के सामाजिक माहौल को दर्शाता था। लोगों को हंसी-मज़ाक और एक्शन का मिश्रण चाहिए था। यह फिल्म उस डिमांड को पूरा करने में सफल रही। आज भी जब हम इस गाने को सुनते हैं तो एक विशेष जुड़ाव महसूस होता है।
हाँ, मैं Megha Khairnar से पूरी तरह सहमत हूं! यह फिल्म वास्तव में उस युग की झलक दिखाती है। मुझे याद आता है कि जब मैं छोटा था, तो हमारे घर में इस फिल्म के गाने बजते रहते थे। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि परिवार के साथ बांटने वाली एक याद थी। आज के डिजिटल दौर में भी ये पुरानी फिल्में हमें अपने जड़ों से जोड़े रखती हैं।
सच बताऊं तो मुझे इस पोस्ट ने बहुत अच्छा लगा। अक्सर हम सिर्फ बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर ध्यान देते हैं, लेकिन पीछे की कहानियां जैसे नरीमन ईरानी का संघर्ष या जaved Akhtar की टिप्पणी बहुत रोचक होती हैं। यह जानकर अच्छा लगा कि आपने इन पहलुओं को उजागर किया है।
विवाद तो चलते रहेंगे, यह इस इंडस्ट्री की प्रकृति है। लेकिन सच यह है कि 'डॉन' ने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी। इसके बाद कई कॉपी कैट्स आईं, लेकिन मूल का जादू आज भी बना हुआ है। RD News Network जैसे चैनलों ने इसे फिर से लाइमलाइट में लाया है, जिससे नई पीढ़ी को भी इसकी जानकारी हो रही है।
आप सभी यहाँ 'गाने' की महिमा गा रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि अगर अमिताभ बच्चन की स्क्रीन प्रेजेंस न होती तो क्या यह गाना इतना हिट होता? गाना सिर्फ एक माध्यम था, असली किरदार अमिताभ थे। यह एक तार्किक विरोधाभास है कि हम एक गाने को श्रेय देते हैं जबकि नायक ही फिल्म की जान होते हैं।